नई दिल्ली, 29 जुलाई। जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर प्रमुख विपक्षी दल पीडीपी के आरोप और उसके बाद उमर के इस्तीफे को भले ही राजनीतिक ड्रामा माना जा रहा हो, पर खुफिया एजेंसियों का मानना है कि यह घाटी में सक्रिय भारत विरोधी अलगाववादी ताकतों की सुनियोजित साजिश का हिस्सा है। खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, हिंसा के जरिए सफल नहीं हो पा रही ताकतें और उनके समर्थक नेता अब घाटी में अस्थिरता फैलाने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। पहले उन्होंने सुरक्षा बलों को बदनाम करके कटघरे में खडा किया, अब नेता उनके इशारे पर हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि यह काम भी वह नेताओं से ही करवा रहे हैं। आईबी से जुडे सीनियर अफसर ने बताया कि अलगाववादी ताकतें और उनके आका सामाजिक मुद्दों के जरिए दबाव बनाने और उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालने की रणनीति अपना रहे हैं। यह अलग बात है कि उमर अब्दुल्ला ने इस्तीफा देकर महबूबा मुफ्ती को करारार झटका दिया है।
लेकिन हंगामा खडा करने में तो कामयाबी मिल ही गई। उक्त अधिकारी के मुताबिक, घाटी में सक्रिय अलगाववादी और पाक-परस्त राजनीतिक दल सुरक्षा बलों को बदनाम करने की सुनियोजित मुहिम चलाते रहे हैं। दुनियाभर में चल रहे आतंक-विरोधी मुहिम और पाकिस्तान पर बढे अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण अलगाववादियों ने रणनीति बदली है। पिछले साल अमरनाथ यात्रा के दौरान ही यह मुहिम शुरू हुई थी। तब अमरनाथ श्रीइन बोर्ड को जमीन देने के मुद्दे पर पीडीपी ने कांग्रेस गठबंधन से अलग होकर सरकार गिरवा दी थी। उसके बाद अलगाववादियों ने एक ओर तो मुजफ्फराबाद से व्यापार करने का ऎलान किया, दूसरी ओर पूरी दुनिया को यह जताने की कोशिश की कि शेष भारत ने कश्मीर की नाकेबंदी कर दी है और लोग वहां भूखों मरने के कगार पर हैं।
इस पूरे आंदोलन में पीडीपी काफी सक्रिय रही थी। जिस सेक्स स्कैंडल को लेकर उमर अब्दुल्ला पर आरोल लगाया गया है, वह कांड उस समय हुआ था, जब प्रदेश में पीडीपी और कांग्रेस की सरकार थी। अगर उमर अब्दुल्ला का नाम चार्जशीट में था, तो पीडीपी ने उनके खिलाफ तब कदम क्यों नहीं उठाए। क्यों नहीं तब उनका नाम उजागर किया गया। उक्त अधिकारी के मुताबिक, खुद महबूबा मुफ्ती ने तब यह तथ्य उजागर क्यों नहीं किया, जबकि सरकार के पास सारी जानकारी थी।
खुफिया एजेंसियों का कहना है कि जिस लिस्ट का उल्लेख मंगलवार को कश्मीर विधानसभा में किया गया है, वह अब कहां से आ गई। उससे भी बडा सवाल यह है कि कोर्ट पहुंचने के बजाय वह पीडीपी तक कैसे पहुंच गई। इन सवालों का उत्तर खोजा जाना चाहिए।
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